संत मरकुस (Saint Mark the Evangelist) प्रथम शताब्दी की मसीही कलीसिया के निडर सेवक, प्रेरितों के सहयोगी और बाइबल के सबसे पहले सुसमाचार के रचयिता हैं। उनका पारिवारिक घर यरूशलेम की वही पावन अटारी है जहाँ मसीही इतिहास में पहली बार पवित्र आत्मा का महा-अभिषेक हुआ था।
---
 |
| Young Saint Mark in Cenacle |
संत मरकुस का प्रारंभिक जीवन, भाषा-विज्ञान और पारिवारिक पृष्ठभूमि
संत मरकुस का इतिहास और उनका आध्यात्मिक योगदान समझने के लिए उनके प्रारंभिक जीवन, पारिवारिक परिवेश और उनके नाम के भाषाई अर्थ को गहराई से समझना आवश्यक है। प्रथम शताब्दी के यहूदी समाज में, विशेषकर रोमी साम्राज्य के विभिन्न प्रान्तों में निवास करने वाले यहूदियों के बीच दो नाम रखने की परंपरा बहुत व्यापक रूप से प्रचलित थी। उनका मूल यहूदी नाम **'यूहन्ना'** (हिब्रू भाषा में योहानान) था, जिसका शाब्दिक अर्थ "परमेश्वर अनुग्रहकारी है" या "यहोवा दयालु है" होता है। यह नाम उनके परिवार की गहरे आध्यात्मिक विश्वास और ईश्वर के प्रति भक्ति को दर्शाता है।
वहीं दूसरी ओर, उनका रोमी व यूनानी नाम **'मरकुस'** (लातिनी भाषा में मार्कस) था, जिसका अर्थ "वफादार", "योद्धा" या "बलिष्ठ रक्षक" होता है। प्रथम शताब्दी के रोमी साम्राज्य के प्रशासनिक, व्यापारिक और नागरिक जीवन में सहूलियत और गैर-यहूदी समाज के साथ संवाद स्थापित करने के लिए उनका परिवार इन दोनों नामों का उपयोग करता था। पवित्र बाइबल के नए नियम और प्रेरितों के काम नामक पुस्तक में उन्हें कई स्थानों पर 'यूहन्ना जो मरकुस कहलाता है' के रूप में संबोधित किया गया है।
संत मरकुस का जन्म लगभग पहली शताब्दी के शुरुआती वर्षों में उत्तरी अफ्रीका के सीरेने (जो वर्तमान समय में लीबिया देश के तटीय क्षेत्र के अंतर्गत आता है) नामक एक अत्यंत समृद्ध और सुसंस्कृत शहर में हुआ था। सीरेने उस दौर में यूनानी दर्शनशास्त्र, यहूदी धर्मशास्त्र, उच्च शिक्षा और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का एक विशाल केंद्र माना जाता था। वे एक कुलीन, संभ्रांत, शिक्षित और समृद्ध यहूदी परिवार में जन्मे थे। जब मरकुस बाल्यकाल में ही थे, तब उत्तरी अफ्रीका में हुए कबीलाई छापों, सामाजिक उथल-पुथल और राजनीतिक अस्थिरता के कारण उनके पिता और माता मरिया अपनी विशाल धन-संपत्ति के साथ सीरेने छोड़कर यरूशलेम आ बसे।
यरूशलेम में आगमन के पश्चात् उनके परिवार ने शहर के एक प्रमुख और सुरक्षित हिस्से में एक विशाल दोमंजिला भवन खरीदा। संत मरकुस की माता **'मरिया' (Mary of Jerusalem)** एक अत्यंत धर्मपरायण, ईश्वरभक्त और समर्पित महिला थीं, जिन्होंने प्रभु यीशु मसीह के सार्वजनिक सेवकाई काल के दौरान उनके सुसमाचार को सहर्ष स्वीकार किया। उन्होंने अपनी विशाल धन-संपत्ति और अपने भवन को ईश्वरीय कार्य और मसीही समाज की सेवा के लिए पूरी तरह समर्पित कर दिया।
जब यरूशलेम में यहूदी धर्मशास्त्रियों, महायाजकों और रोमी अधिकारियों द्वारा शुरुआती मसीहियों पर अत्याचार बढ़ने लगे, तब मरकुस की माता का यह घर यरूशलेम के विश्वासी समाज, प्रेरितों और प्रभु के शिष्यों के लिए एक अत्यंत सुरक्षित आश्रय स्थल बन गया। यहाँ मसीही विश्वासी गुप्त रूप से एकत्र होते थे, एक मन होकर रो-रोकर प्रार्थना करते थे और प्रभु भोज की संगति में भाग लेते थे।
---
प्रभु यीशु मसीह से प्रथम परिचय और प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य
प्राचीन कलीसियाई परंपराओं, शुरुआती धर्मशास्त्रियों और बाइबल विद्वानों के अनुसार, संत मरकुस अपनी युवावस्था के दौरान प्रभु यीशु मसीह के सार्वजनिक सेवकाई काल (लगभग 27 ईस्वी से 30 ईस्वी) के दौरान सीधे तौर पर उनके संपर्क में आए थे। यद्यपि संत मरकुस मुख्य बारह प्रेरितों की सूची में शामिल नहीं थे, परंतु वे उन सत्तर शिष्यों के दल में शामिल थे जिन्हें प्रभु यीशु मसीह ने दो-दो करके विभिन्न नगरों में सुसमाचार के प्रचार और चंगाई की सेवकाई के लिए भेजा था।
प्रभु यीशु मसीह के जीवन के अंतिम पलों और गेतशमनी के बगीचे में उनकी गिरफ्तारी की रात का एक अत्यंत विशिष्ट और प्रामाणिक संदर्भ मरकुस के सुसमाचार में देखने को मिलता है। जब रोमी सिपाहियों और महायाजक के सेवकों ने गेतशमनी के बगीचे में यीशु मसीह को गिरफ्तार किया, तो भय के कारण उनके सभी मुख्य शिष्य यीशु को छोड़कर भाग गए। उस ऐतिहासिक और भयानक रात में एक नवयुवक केवल एक चादर ओढ़े यीशु के पीछे-पीछे चल रहा था।
जब रोमी सिपाहियों ने उस नवयुवक को भी पकड़ने का प्रयास किया, तो वह अपनी चादर सिपाहियों के हाथों में छोड़कर नंगा भाग निकला। बाइबल के अनेक विद्वानों और कलीसियाई इतिहासशास्त्रियों का यह दृढ़ मानना है कि वह नवयुवक स्वयं संत मरकुस ही थे। उन्होंने प्राचीन यहूदी और यूनानी लेखन शैली के अनुसार अपनी पहचान गुप्त रखते हुए अपने स्वयं के प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य को अपने सुसमाचार (मरकुस 14:51-52) में दर्ज किया था।
---
यरूशलेम की अटारी का संपूर्ण इतिहास और तीन महा-घटनाएँ
यरूशलेम में स्थित संत मरकुस की माता मरिया का घर संपूर्ण मसीही इतिहास में *"मदर चर्च"*(Mother Church of Jerusalem) अर्थात् मसीही कलीसिया के जन्मस्थान के रूप में जाना जाता है। इस विशाल और ऐतिहासिक भवन की ऊपरी मंजिल पर बनी अटारी (Upper Room / Cenacle) में तीन ऐसी युग-परिवर्तकारी और अलौकिक घटनाएँ घटीं जिन्होंने न केवल प्रथम शताब्दी के मसीही समाज को बदल दिया, बल्कि विश्व इतिहास की दिशा भी बदल दी।
• फसह का अंतिम भोजन (The Last Supper):** प्रभु यीशु मसीह ने अपने क्रूसारोपण और बलिदान से ठीक एक रात पहले फसह का पावन पर्व मनाने के लिए यरूशलेम के इसी भवन की ऊपरी मंजिल वाले सुसज्जित कमरे को चुना। यहीं पर प्रभु यीशु ने अपने बारह प्रेरितों के साथ अपना ऐतिहासिक अंतिम भोजन किया। इसी पवित्र स्थान पर यीशु मसीह ने अपने शरीर और लहू के प्रतीक के रूप में रोटी तोड़ने और अंगूर का रस पीने की पवित्र प्रथा ( Holy Communion / प्रभु भोज ) की स्थापना की, जो आज भी पूरे विश्व की हर मसीही कलीसिया में मनाई जाती है।
• जी उठने के बाद यीशु का प्रकटीकरण:** यीशु मसीह के क्रूस पर बलिदान होने के पश्चात् जब यहूदी धर्मशास्त्रियों, महायाजकों और रोमी सैनिकों के दमन और गिरफ्तारी के भय से सभी शिष्य अत्यंत व्याकुल और भयभीत थे, तब वे इसी अटारी में दरवाजे बंद करके शरण लेते थे। वे यहाँ एक मन होकर निरंतर प्रार्थना करते थे। अपने जी उठने के पश्चात्, प्रभु यीशु बंद कमरों के बावजूद अलौकिक रूप से दो बार इसी अटारी में शिष्यों के बीच प्रकट हुए। उन्होंने उन्हें अपने घाव दिखाए, अपनी दिव्य शांति प्रदान की और पवित्र आत्मा प्राप्त करने का सामर्थ्य दिया।
• पेन्तेकुस्त के दिन पवित्र आत्मा का महा-अभिषेक:** यीशु मसीह के स्वर्गारोहण के दस दिनों के पश्चात्, जब एक सौ बीस विश्वासी (जिनमें प्रभु यीशु की माता मरिया, बारह प्रेरित, अन्य सेविकाएँ और संत मरकुस का पूरा परिवार शामिल था) इसी अटारी में लगातार प्रार्थना और उपवास में लीन थे, तब **पेन्तेकुस्त (Pentecost)** के पावन दिन पवित्र आत्मा का पहला सामूहिक महा-अभिषेक हुआ। आकाश से अचानक एक बड़ी सनसनाती हुई हवा की आवाज़ आई और आग की जीभों के रूप में पवित्र आत्मा उन पर उतरा, जिससे मसीही कलीसिया का विधिवत जन्म हुआ।
---
पवित्र आत्मा के उतरने के प्रामाणिक बाइबल संदर्भ
मसीही इतिहास और बाइबल शोधकर्ताओं के लिए यरूशलेम की अटारी और पवित्र आत्मा के अभिषेक की सत्यता को सिद्ध करने के लिए पवित्र बाइबल के **'प्रेरितों के काम' (Acts of the Apostles)** पुस्तक में तीन अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रामाणिक संदर्भ दर्ज किए गए हैं:
1. अटारी में निरंतर प्रार्थना का स्थान
यीशु मसीह के स्वर्गारोहण के पश्चात् सभी प्रेरित और विश्वासी जिस पवित्र स्थान पर एकत्र होकर प्रार्थना करते थे, उसका स्पष्ट उल्लेख बाइबल के इस पद में मिलता है:
*"और जब वे पहुंचे, तो उस अटारी (Upper Room) पर गए जहां पतरस, और यूहन्ना, और याकूब, और अन्द्रियास, फिलिप और थोमा, बरतुलमै और मत्ती, हलफई का पुत्र याकूब और शमौन जेलोतेस और याकूब का पुत्र यहूदा रहते थे। ये सब कई स्त्रियों और यीशु की माता मरिया और उसके भाइयों के साथ एक मन होकर प्रार्थना में लगे रहे।"*
— **प्रेरितों के काम 1:13-14**
2. पेंटेकोस्ट के दिन पवित्र आत्मा का अलौकिक आगमन
पेन्तेकुस्त के पावन दिन पर जब पवित्र आत्मा का पहला महा-अभिषेक विश्वासी समाज पर हुआ, तो उस अलौकिक घटना का ऐतिहासिक विवरण इस प्रकार दर्ज है:
*"जब पेन्तेकुस्त का दिन आया, तो वे सब एक जगह इकट्ठे थे। और एकाएक आकाश से बड़ी आँधी की सी सनसनाती हुई आवाज आई, और उससे सारा घर जहाँ वे बैठे थे, गूंज गया। और उन्हें आग की सी जीभें अलग-अलग ठहरती हुई दिखाई दीं। और वे सब पवित्र आत्मा से भर गए, और जिस प्रकार आत्मा ने उन्हें बोलने की सामर्थ्य दी, वे अन्य अन्य भाषा बोलने लगे।"*
— **प्रेरितों के काम 2:1-4**
3. मरकुस की माता के घर का स्पष्ट बाइबल प्रमाण
जब प्रेरित पतरस को राजा हेरोदेस ने जेल में बंद कर दिया था और परमेश्वर के स्वर्गदूत ने उन्हें अलौकिक रूप से रिहा कराया, तो पतरस का सीधे संत मरकुस की माता के घर आना इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि वह भवन ही शुरुआती कलीसिया का मुख्य प्रार्थना केंद्र था:
*"जब वह (पतरस) सोच ही रहा था, तो यूहन्ना के, जो मरकुस कहलाता है, माता मरिया के घर आया; जहाँ बहुत लोग इकट्ठे होकर प्रार्थना कर रहे थे।"*
— **प्रेरितों के काम 12:12**
संत मरकुस की मिशनरी यात्राएं: पौलुस, बरनाबास और पतरस के साथ ऐतिहासिक कालक्रम
यरूशलेम की अटारी (Mother Church of Jerusalem) में पवित्र आत्मा का पहला महा-अभिषेक प्राप्त करने के पश्चात् संत मरकुस केवल यरूशलेम तक सीमित नहीं रहे। वे प्रथम शताब्दी के तत्कालीन रोमी साम्राज्य में सुसमाचार का निर्भीकता से प्रचार करने वाले एक अत्यंत व्यावहारिक, साहसी और समर्पित मिशनरी बने। उन्होंने उस कालखंड के दो सबसे प्रभावशाली प्रेरितों—संत पौलुस और संत पतरस के साथ मिलकर भूमध्यसागरीय क्षेत्र (Mediterranean Region) के विभिन्न देशों, द्वीपों और प्रांतीय नगरों में कलीसियाओं की स्थापना और विस्तार के लिए हज़ारों मील की अत्यंत जोखिम भरी यात्राएँ कीं।
1. प्रेरित पौलुस और बरनाबास के साथ प्रथम मिशनरी यात्रा (लगभग 45-48 ईस्वी)
संत मरकुस का पारिवारिक संबंध प्रेरित बरनाबास से अत्यंत आत्मीय था; वे प्रेरित बरनाबास के सगे भतीजे थे (बाइबल संदर्भ: कुलुस्सियों 4:10) जब सीरियाई अंताकिया (Antioch in Syria) की जीवंत और गतिशील कलीसिया में उपवास और सामूहिक प्रार्थना का दौर चल रहा था, तब पवित्र आत्मा ने स्पष्ट निर्देश दिया कि पौलुस और बरनाबास को गैर-यहूदी (Gentile) जगत में सुसमाचार प्रचार के विशेष कार्य हेतु अलग किया जाए।
इस ऐतिहासिक प्रथम मिशनरी यात्रा (First Missionary Journey - लगभग 45 से 48 ईस्वी) के दौरान प्रेरित पौलुस और बरनाबास ने युवा यूहन्ना मरकुस को अपने मुख्य सहायक, व्यावहारिक प्रबंधक और सहभागी (Minister/Assistant) के रूप में चुना। वे सीरियाई अंताकिया से प्रस्थान करके सिलूकिया (Seleucia) के भूमध्यसागरीय बंदरगाह पहुँचे और वहाँ से जलमार्ग द्वारा साइप्रस द्वीप (Cyprus) की ओर बढ़े। साइप्रस के सालामीस (Salamis) और पाफुस (Paphos) नगरों में सुसमाचार का सफलतापूर्वक प्रचार करने और रोमी सूबेदार सिरगियस पौलुस (Sergius Paulus) को विश्वासी बनाने के पश्चात्, वे समुद्र पार करके एशिया माइनर (वर्तमान तुर्की) के पंफूलिया प्रदेश के तटीय शहर 'पिरगा' (Perga in Pamphylia) पहुँचे।
2. की ऐतिहासिक घटना, आत्मिक संपिरगाघर्ष और पौलुस के साथ मतभेद
पिरगा शहर पहुँचने के पश्चात् मिशनरी दल को अत्यंत विकट, भयावह और कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। प्रथम शताब्दी के उस दौर में पंफूलिया और टॉरस पर्वत श्रृंखला (Taurus Mountains) के बीहड़ इलाके हिंसक डाकुओं, जंगली जानवरों और मलेरिया जैसी जानलेवा बीमारियों के प्रकोप से भरे हुए थे। इसके अतिरिक्त, गैर-यहूदी समाज में सुसमाचार प्रचार के दौरान स्थानीय यहूदी कट्टरपंथियों द्वारा तीव्र आध्यात्मिक व सामाजिक विरोध किया जा रहा था और रोमी प्रशासन का रवैया भी अत्यंत सख्त था।
युवावस्था की स्वाभाविक झिझक, अत्यधिक शारीरिक थकान, बीहड़ रास्तों के खतरों और यरूशलेम में अपनी माता मरिया के सुरक्षित भवन की याद के कारण यूहन्ना मरकुस पिरगा में यात्रा को बीच में ही छोड़ गए। वे पौलुस और बरनाबास को छोड़कर वापस यरूशलेम अपने घर लौट आए (बाइबल संदर्भ: प्रेरितों के काम 13:13) इस घटना से प्रेरित पौलुस अत्यंत दुःखी और असंतुष्ट हुए। प्रेरित पौलुस के स्वभाव में सुसमाचार के प्रति पूर्ण समर्पण और अटूट अनुशासन था; वे मिशनरी कार्य में किसी भी प्रकार का ढिलाव या कठिनाई देखकर पीछे हटना कतई स्वीकार नहीं करते थे।
जब लगभग 49-50 ईस्वी में यरूशलेम की पहली कलीसियाई सभा (Jerusalem Council) के पश्चात् द्वितीय मिशनरी यात्रा की योजना बनी, तो प्रेरित बरनाबास अपने भतीजे मरकुस को फिर से अपने साथ ले जाना चाहते थे। परंतु प्रेरित पौलुस ने उस व्यक्ति को अपने साथ ले जाने से स्पष्ट और कड़ा इनकार कर दिया जो पिछली यात्रा में उन्हें पिरगा में छोड़कर चला गया था। इस विषय पर प्रेरित पौलुस और बरनाबास के बीच इतना तीव्र और गंभीर मतभेद हुआ कि दोनों महान प्रेरित एक-दूसरे से अलग हो गए। बरनाबास मरकुस को साथ लेकर साइप्रस द्वीप चले गए, जबकि पौलुस सीलास को साथ लेकर सीरिया और किलिकिया की ओर बढ़ गए (बाइबल संदर्भ: प्रेरितों के काम 15:36-40) ।
3. मरकुस का आत्मिक सुधार, परिपक्वता और पौलुस की अंतिम स्वीकृति
यद्यपि पिरगा से लौटने की घटना मरकुस के शुरुआती जीवन में एक विफलता जैसी प्रतीत होती थी, परंतु मरकुस ने इस असफलता से कभी हार नहीं मानी। उन्होंने अपने आत्मिक पिता और चाचा प्रेरित बरनाबास के योग्य मार्गदर्शन में साइप्रस में कई वर्षों तक निरंतर सेवकाई करते हुए खुद को आत्मिक रूप से परिपक्व बनाया। उन्होंने अपनी मानसिक व शारीरिक कमजोरियों पर विजय प्राप्त की और खुद को सुसमाचार का एक निडर व समर्पित योद्धा साबित किया।
समय के साथ संत मरकुस का समर्पण इतना अटूट हो गया कि प्रेरित पौलुस के मन में उनके प्रति बना सारा मतभेद और अविश्वास पूरी तरह मिट गया। वर्षों पश्चात् (लगभग 66-67 ईस्वी में), जब प्रेरित पौलुस रोमी सम्राट नीरो के शासनकाल में रोम के भयानक कारागार में ज़ंजीरों में जकड़े हुए अपनी शहादत की प्रतीक्षा कर रहे थे, तब उन्होंने अपनी अंतिम पत्री में अपने प्रिय शिष्य तीमुथियुस को निर्देश देते हुए लिखा: *"मरकुस को अपने साथ लेते आना, क्योंकि वह सेवकाई के लिए मेरे बहुत काम का है"* (बाइबल संदर्भ: 2 तीमुथियुस 4:11) यह ऐतिहासिक प्रमाण दर्शाता है कि मरकुस ने अपनी पुरानी गलती को मिटाकर कलीसियाई इतिहास में अपना एक अत्यंत आदरणीय और विश्वसनीय स्थान बना लिया था।
4. प्रेरित पतरस के साथ घनिष्ठ संबंध, अनुवादक की भूमिका और रोम यात्रा
संत मरकुस का सबसे गहरा, आत्मीय, पिता-तुल्य और ऐतिहासिक संबंध मुख्य प्रेरित संत पतरस (Saint Peter) के साथ विकसित हुआ। यरूशलेम में जब संत पतरस राजा हेरोदेस अग्रिप्पा की जेल से परमेश्वर के स्वर्गदूत द्वारा अलौकिक रूप से रिहा हुए थे, तो वे सीधे संत मरकुस की माता मरिया के घर ही पहुँचे थे। पतरस मरकुस के पारिवारिक परिवेश से बचपन से भली-भांति परिचित थे और वे मरकुस को अपने सगे आत्मिक पुत्र के समान प्रेम करते थे। संत पतरस ने अपनी पहली पत्री में मरकुस के प्रति अपने इसी आत्मीय भाव को प्रकट करते हुए लिखा: *"मेरा पुत्र मरकुस तुम्हें नमस्कार कहता है"* (बाइबल संदर्भ: 1 पतरस 5:13)।
लगभग 50 से 65 ईस्वी के दौरान, जब संत पतरस रोमी साम्राज्य की राजधानी रोम शहर में सुसमाचार का निर्भीकता से प्रचार कर रहे थे, तब संत मरकुस उनके मुख्य अनुवादक (Interpreter / Hermeneutes), निजी सचिव और सहयोगी के रूप में कार्य कर रहे थे। चूंकि संत पतरस की मूल मातृभाषा अरामी (Aramaic) थी, जबकि रोम की रोमी जनता लातिनी और यूनानी (Greek) भाषा बोलती थी, इसीलिए पतरस द्वारा दिए जाने वाले उपदेशों का रोमी नागरिकों के लिए सटीक भाषांतर करना संत मरकुस का ही मुख्य कार्य था। पतरस द्वारा प्रभु यीशु मसीह के जीवन, उनके अलौकिक चमत्कारों, उनके उपदेशों और उनके क्रूसारोपण व जी उठने की दी गई आँखों देखी गवाहियों को मरकुस ने अत्यंत बारीकी से अपने मन में संजो कर रखा था।
---
'मरकुस का सुसमाचार': गहन विश्लेषणात्मक अध्ययन, कालक्रम और विशेषताएं
पवित्र बाइबल के नए नियम (New Testament) में दर्ज चारों सुसमाचारों (मत्ती, मरकुस, लूका और यूहन्ना) में से मरकुस का सुसमाचार ऐतिहासिक रूप से सबसे पहले लिखा गया सुसमाचार (First Written Gospel) माना जाता है। बाइबल विद्वानों, भाषाविदों और कलीसियाई इतिहासशास्त्रियों (जैसे यूसेबियस और संत इरैनियस) के अनुसार, इस पवित्र पुस्तक की रचना लगभग 55 ईस्वी से 65 ईस्वी के बीच रोम शहर में हुई थी। यह सुसमाचार वास्तव में मुख्य प्रेरित संत पतरस द्वारा दिए गए उपदेशों और उनकी प्रत्यक्षदर्शी गवाहियों का प्रामाणिक लिखित दस्तावेजीकरण है।
1. रोमी मानसिकता और गैर-यहूदी पाठकों के अनुकूल अद्वितीय लेखन शैली
संत मरकुस ने जब इस सुसमाचार की रचना की, तो उनके मुख्य पाठक रोमी साम्राज्य के गैर-यहूदी (Gentile) नागरिक थे। रोमी संस्कृति के लोग व्यावहारिक, कर्मप्रधान, सैन्य-शक्ति में विश्वास रखने वाले, अधिकार-प्रिय और परिणाम-केंद्रित लोग थे। उन्हें यहूदी रीति-रिवाजों, लंबी यहूदी वंशावलियों या विस्तृत धार्मिक व्याख्यानों में अधिक रुचि नहीं थी। इसी कारण संत मरकुस ने अपनी पुस्तक में मत्ती या लूका की भांति यीशु मसीह की लंबी वंशावली देने के बजाय सीधे बाप्तिस्मा देने वाले यूहन्ना के प्रचार और यीशु की सामर्थी सेवकाई से शुरुआत की।
मरकुस ने अपनी पुस्तक में यहूदी परंपराओं (जैसे हाथ धोने के नियम, फसह पर्व आदि) का रोमी पाठकों के लिए स्पष्ट अनुवाद और व्याख्या प्रस्तुत की। उन्होंने प्रभु यीशु मसीह द्वारा किए गए अलौकिक चमत्कारों, दुष्टात्माओं को निकालने, बीमारियों को चंगा करने और प्रकृति की तूफानी लहरों पर उनके अधिकार को प्रमुखता से चित्रित किया। उन्होंने रोमी पाठकों को दर्शाया कि यीशु मसीह केवल दर्शनशास्त्र के ज्ञानी नहीं, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड और आत्माओं पर परमेश्वर का सामर्थ्य रखने वाले जीवित प्रभु हैं।
2. यूनानी शब्द "ईथुस" (Euthus) की तीव्र गतिशीलता और भाषाई सौंदर्य
संत मरकुस की मूल यूनानी रचना की एक सबसे बड़ी भाषाई और साहित्यिक विशेषता यह है कि उन्होंने इसमें यूनानी शब्द **"ईथुस" (Euthus - जिसका अर्थ 'तुरंत', 'शीघ्र', 'तत्काल' या 'उसी क्षण' होता है)** का प्रयोग 40 से भी अधिक बार किया है। यह शब्द पाठकों के मन में एक अत्यंत तीव्र, जीवंत और गतिशील दृश्य प्रस्तुत करता है। मरकुस यह दर्शाना चाहते थे कि प्रभु यीशु मसीह का मानव जाति के उद्धार का कार्य कितना अति-महत्वपूर्ण है और परमेश्वर का राज्य बिना किसी विलंब के मनुष्यों के जीवन में प्रकट हो रहा है।
3. 'दुःखी एवं निष्पादित सेवक' (Servant King) का दिव्य चित्रण
मरकुस के सुसमाचार की सबसे मुख्य धार्मिक और आध्यात्मिक विषय-वस्तु प्रभु यीशु मसीह को परमेश्वर के उस नम्र और निष्पादित सेवक के रूप में प्रस्तुत करना है, जो दुनिया पर शासन करने या दूसरों से सेवा कराने नहीं आया, बल्कि स्वयं दूसरों की सेवा करने और संपूर्ण मानवता के पापों के उद्धार हेतु अपना प्राण फिरौती के रूप में देने आया था।
मरकुस के सुसमाचार का केंद्रीय पद इस महान सत्य को स्पष्ट रूप से उद्घाटित करता है:
*"क्योंकि मनुष्य का पुत्र भी इसलिये नहीं आया कि उसकी सेवा की जाए, पर इसलिये आया कि सेवा करे, और बहुतों की फिरौती के लिये अपना प्राण दे"*
— **मरकुस 10:45**
यह सुसमाचार सम्राट नीरो के भयानक अत्याचारों में सताए जा रहे रोमी मसीहियों को यह संदेश देता था कि यदि उनका प्रभु स्वयं दुःखों से होकर गुज़रा और क्रूस पर विजयी हुआ, तो वे भी अपने विश्वास में स्थिर रहकर अंतिम विजय प्राप्त कर सकते हैं।
मिस्र में सुसमाचार का आगमन और सिकंदरिया की कलीसिया का विस्तृत इतिहास
रोम शहर में जब रोमी सम्राट नीरो के शासनकाल में मसीही विश्वासी समाज पर भयानक और अमानवीय अत्याचार किए जा रहे थे, और मुख्य प्रेरित संत पतरस व संत पौलुस रोम में शहीद हो गए, तब संत मरकुस पवित्र आत्मा की स्पष्ट प्रेरणा और मार्गदर्शन में सुसमाचार का संदेश लेकर अफ़्रीका महाद्वीप के सबसे प्रमुख देश मिस्र (Egypt) की ओर बढ़े। पहली शताब्दी के उस दौर में मिस्र का 'सिकंदरिया' (Alexandria) नगर पूरे विशाल रोमी साम्राज्य में राजधानी रोम के बाद दूसरा सबसे बड़ा, समृद्ध, सांस्कृतिक, दार्शनिक और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का केंद्र माना जाता था। सिकंदरिया शहर उस कालखंड में अपनी प्रसिद्ध लाइब्रेरी (Library of Alexandria), यूनानी दर्शनशास्त्र, विज्ञान और विविध बहुदेववादी मूर्तिपूजा का मुख्य गढ़ था।
कलीसियाई इतिहासशास्त्रियों (जैसे यूसेबियस, संत जेरोम और कॉप्टिक परंपराओं) के प्रामाणिक दस्तावेज़ों के अनुसार, जब संत मरकुस पहली बार सिकंदरिया की पत्थरीली सड़कों पर पैदल प्रवेश कर रहे थे, तो लगातार चलने के कारण उनकी चप्पल (जूता) टूट गई। अपनी चप्पल की मरम्मत कराने हेतु वे सिकंदरिया के एक स्थानीय यहूदी मोची के पास गए, जिसका नाम 'अनियानुस' (Anianus) था। जब अनियानुस सूए (चमड़ा सिलने का औज़ार) से चप्पल की मरम्मत कर रहा था, तो अचानक सूआ छिटककर उसके बाएँ हाथ के अँगूठे में बड़ी गहराई तक धँस गया। घाव इतना गहरा था कि भयंकर रक्तस्राव होने लगा और अनियानुस दर्द के मारे चिल्ला उठा।
संत मरकुस ने उस मोची के प्रति अपार ईश्वरीय करुणा दिखाई। उन्होंने ज़मीन से थोड़ी मिट्टी ली, उस पर थूक मिलाकर एक लेप बनाया और प्रभु यीशु मसीह के पवित्र नाम का उच्चारण करते हुए उस मोची के ज़ख्म पर लगा दिया। उसी पल अनियानुस का बहता हुआ ख़ून रुक गया, घाव पूरी तरह चंगा हो गया और उसका असहनीय दर्द गायब हो गया। इस अलौकिक चमत्कार को देखकर अनियानुस स्तब्ध रह गया। उसने संत मरकुस को सादर अपने घर आमंत्रित किया और उनके द्वारा दिए जा रहे प्रभु यीशु के सुसमाचार को ध्यानपूर्वक सुना। अनियानुस और उसके पूरे घराने ने प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास व्यक्त किया और बपतिस्मा लिया।
अनियानुस का घर मिस्र में मसीही विश्वासियों के एकत्र होने का पहला मुख्य केंद्र बना। संत मरकुस ने मिस्र की शुरुआती कलीसिया को आध्यात्मिक रूप से सुदृढ़ बनाया और आगे चलकर इसी अनियानुस को सिकंदरिया का पहला विशप (Bishop of Alexandria) नियुक्त किया।
कॉप्टिक आर्थोडॉक्स कलीसिया और अफ़्रीका का पहला बाइबल स्कूल
संत मरकुस द्वारा मिस्र के सिकंदरिया शहर में स्थापित की गई कलीसिया को संपूर्ण विश्व इतिहास में **कॉप्टिक आर्थोडॉक्स कलीसिया (Coptic Orthodox Church of Alexandria)** के नाम से जाना जाता है। 'कॉप्ट' शब्द प्राचीन मिस्र के मूल निवासियों (Copts) के लिए प्रयोग किया जाता था। संत मरकुस को मिस्र की इस ऐतिहासिक कलीसिया का संस्थापक, पहला विशप और पूरे अफ़्रीका महाद्वीप का पहला पेट्रिआर्क (Pope & Patriarch of Alexandria) माना जाता है।
संत मरकुस के साहसी उपदेशों, उनके व्यक्तिगत चरित्र की पवित्रता और उनके हाथों से हो रहे अलौकिक चमत्कारों के कारण मिस्र के हज़ारों निवासियों ने प्राचीन मिस्र की मूर्तिपूजा, जादू-टोने और रोमी देवताओं की पूजा को त्यागकर प्रभु यीशु मसीह के सच्चे मार्ग को अपनाया। संत मरकुस ने न केवल सिकंदरिया नगर में, बल्कि मिस्र के आंतरिक ग्रामीण इलाकों, तटीय क्षेत्रों और उत्तरी अफ़्रीका के विभिन्न हिस्सों में घूम-घूमकर कलीसियाओं की स्थापना की, पादरियों व सेवकों को नियुक्त किया और कलीसियाई व्यवस्था को एक सुदृढ़ ढांचा प्रदान किया।
सिकंदरिया उस समय यूनानी दार्शनिकों, प्लेटो के अनुयायियों और मूर्तिपूजक विचारकों का गढ़ था, जो मसीही धर्म की शिक्षाओं को बौद्धिक चुनौती देते थे। इस बौद्धिक चुनौती का सामना करने और नए मसीही विश्वासियों को बाइबल के गहरे धर्मशास्त्र में परिपक्व बनाने के लिए संत मरकुस ने लगभग 60 से 62 ईस्वी के बीच सिकंदरिया में विश्व के सबसे पहले मसीही धर्मशास्त्रीय विद्यालय **(School of Alexandria / Catechetical School)** की नींव रखी।
यह विद्यालय केवल धार्मिक शिक्षा का केंद्र नहीं था, बल्कि यहाँ मसीही धर्मशास्त्र के साथ-साथ गणित, विज्ञान, यूनानी साहित्य, दर्शनशास्त्र और तर्कशास्त्र की भी उच्च स्तरीय शिक्षा दी जाती थी। आगे चलकर इसी विद्यालय ने क्लेमेंट ऑफ अलेक्जेंड्रिया, ओरिजन, संत एथानासियस और संत सिरिल जैसे विश्वप्रसिद्ध मसीही विद्वानों को जन्म दिया, जिन्होंने बाइबल के सिद्धांतों की रक्षा की।
---
संत मरकुस की मृत्यु कैसे हुई? जानिए उनकी शहादत का संपूर्ण इतिहास
अक्सर पाठक और शोधकर्ता इंटरनेट पर खोजते हैं कि **मरकुस की मृत्यु कैसे हुई** या **संत मरकुस का अंत कैसे हुआ**। यहाँ यह अत्यंत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य स्पष्ट करना आवश्यक है कि संत मरकुस की मृत्यु का विस्तृत विवरण पवित्र बाइबल के अंदर दर्ज नहीं है। बाइबल के 'प्रेरितों के काम' की पुस्तक प्रेरित पौलुस के रोम पहुँचने पर समाप्त हो जाती है। संत मरकुस की मृत्यु और उनकी शहादत का यह विस्तृत विवरण हमें प्रथम व द्वितीय शताब्दी के प्रामाणिक कलीसियाई इतिहास (Church History) और कॉप्टिक आर्थोडॉक्स परंपराओं से प्राप्त होता है।
जैसे-जैसे मिस्र में हज़ारों लोग प्राचीन मूर्तिपूजा छोड़कर यीशु मसीह को अपना रहे थे, वैसे-वैसे सिकंदरिया के स्थानीय मूर्तिपूजक पुजारियों, जादू-टोने में लिप्त लोगों और रोमी अफ़सरों के मन में संत मरकुस के प्रति ईर्ष्या, भय और भयानक क्रोध पनपने लगा। संत मरकुस द्वारा ग्रीक देवता 'सेरापिस' (Serapis) की झूठी पूजा का स्पष्ट खंडन किए जाने से मूर्तिपूजक पुजारी उन्हें अपने अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा मानने लगे थे।
25 अप्रैल 68 ईस्वी की दुखद घटना और अमानवीय यातनाएं
लगभग **68 ईस्वी** में एक विशिष्ट ऐतिहासिक संयोग बना। उस वर्ष ईस्टर का पावन पर्व (प्रभु यीशु मसीह के जी उठने का दिन) और मिस्र के स्थानीय देवता सेरापिस का मुख्य वार्षिक त्यौहार एक ही दिन यानी 24 अप्रैल को पड़ गया। एक तरफ जहाँ संत मरकुस सिकंदरिया के समुद्र तट के पास बनी कलीसिया में मसीही विश्वासियों के साथ ईस्टर की पवित्र संगति (प्रभु भोज) चला रहे थे, वहीं दूसरी तरफ मूर्तिपूजकों की भीड़ शहर में अपने देवता के जुलूस में उग्र होकर नाच-गा रही थी।
मूर्तिपूजक पुजारियों ने उग्र भीड़ को भड़काया और हथियारों से लैस हिंसक भीड़ ने कलीसिया पर अचानक धावा बोल दिया। उन्होंने प्रार्थना में लीन विश्वासी समाज के बीच से संत मरकुस को निर्दयतापूर्वक घसीटकर बाहर निकाला। अत्याचारियों ने उनके गले में मोटी-मोटी रस्सियाँ बाँध दीं और उन्हें सिकंदरिया शहर की नुकीली, पत्थरीली और बीहड़ सड़कों पर खींचना शुरू कर दिया।
दो दिनों (24 और 25 अप्रैल) तक उन्हें शहर की पत्थरीली सड़कों पर घसीटा गया, जिससे उनके शरीर की त्वचा पूरी तरह छिल गई, हड्डियाँ टूटने लगीं और अत्यधिक रक्तस्राव होने लगा। इसके बावजूद संत मरकुस ज़ुबान से अपने अत्याचारियों को शाप देने के बजाय ईश्वर का धन्यवाद करते रहे। अंततः *25 अप्रैल 68 ईस्वी* को अत्यधिक चोटों और ख़ून बह जाने के कारण अपनी अंतिम सांस लेते हुए संत मरकुस ने कहा: *"हे प्रभु, मैं अपनी आत्मा तेरे हाथों में सौंपता हूँ।" *यह कहते हुए उन्होंने अपनी शहादत दी और प्राण त्याग दिए।
दफ़नाए जाने से लेकर इटली के वेनिस पहुँचने का 800 सालों का पूरा इतिहास
शहादत के बाद अत्याचारियों ने उनके पवित्र शरीर को जलाने का प्रयास किया, परंतु अचानक आए भयंकर बर्फीले तूफान और मूसलाधार बारिश के कारण आग बुझ गई और भीड़ भाग खड़ी हुई। इसके पश्चात् सिकंदरिया के स्थानीय ईसाइयों ने संत मरकुस के पवित्र देह को आदरपूर्वक उठाकर सिकंदरिया की कलीसिया में ही सम्मानपूर्वक दफनाया। लगभग 750 से अधिक वर्षों तक उनका मक़बरा सिकंदरिया में ही सुरक्षित रहा और दुनिया भर के विश्वासी वहाँ दर्शन करने आते थे।
परंतु नौवीं शताब्दी ( 828 ईस्वी ) में मिस्र पर राजनीतिक परिस्थितियाँ बदलने लगीं और मुस्लिम शासन के अधीन कलीसिया व मक़बरे की सुरक्षा पर ख़तरा मँडराने लगा। उस समय इटली के वेनिस (Venice) शहर से आए दो मसीही व्यापारियों—'रुस्टिको' (Rustico) और 'ट्रिबुनो' (Tribuno) ने सिकंदरिया के कॉप्तिक पादरियों की सहमति से संत मरकुस के पवित्र अवशेषों को सुरक्षित यूरोप ले जाने का ऐतिहासिक निर्णय लिया।
रोमी और स्थानीय अधिकारियों की कड़े पहरे और चेकिंग से बचने के लिए उन्होंने एक अनोखी योजना बनाई। उन्होंने अवशेषों को एक बड़ी टोकरी में रखा और उसके ऊपर सूअर का माँस (Pork) और गोभी के पत्ते ढक दिए। उस दौर में स्थानीय अधिकारी धार्मिक कारणों से सूअर के माँस को छूते भी नहीं थे, इसलिए वे बिना चेकिंग किए दूर हट गए और अवशेषों को सफलतापूर्वक जहाज़ पर चढ़ा लिया गया।
जब यह जहाज़ भूमध्य सागर पार कर रहा था, तो रास्ते में एक भयानक समुद्री तूफ़ान आया। कलीसियाई इतिहास बताता है कि संत मरकुस ने अलौकिक रूप से प्रकट होकर जहाज़ का मार्गदर्शन किया और उसे डूबने से बचाया। 31 जनवरी 828 ईस्वी को जब संत मरकुस के अवशेष इटली के वेनिस शहर पहुँचे, तो पूरे शहर में घंटियाँ बजाकर जश्न मनाया गया। वेनिस के शासक (Doge) ने संत मरकुस को अपने पूरे देश का मुख्य 'संरक्षक संत' (Patron Saint) स्वीकार किया और उनके सम्मान में स्थापत्य कला का अद्भुत अजूबा **'सेंट मार्क्स बेसिलिका' (St. Mark's Basilica)** कैथेड्रल बनाया, जहाँ उनके अवशेष आज भी सुरक्षित रखे हुए हैं।
---
संत मरकुस के जीवन से मिलने वाली व्यावहारिक आत्मिक शिक्षाएं
संत मरकुस का पूरा जीवन 21वीं सदी के हर मसीही विश्वासी, लेखक और पाठक के लिए निम्नलिखित गहरी और व्यावहारिक आत्मिक शिक्षाएं प्रदान करता है:
• असफलताओं से पुनः खड़े होने की प्रेरणा:** संत मरकुस का जीवन हमें सिखाता है कि जीवन में एक बार मिली असफलता अंतिम नहीं होती। पंफूलिया के पिरगा में शुरुआती झिझक के कारण पीछे हटने वाले यूहन्ना मरकुस ने अपनी आत्मिक कमजोरी पर विजय प्राप्त की और बाद में मसीही इतिहास के सबसे महान स्तंभों में से एक बने।
• संसाधनों और धन का ईश्वरीय उपयोग:** संत मरकुस का समृद्ध परिवार चाहता तो अपनी धन-संपत्ति का उपयोग अपने व्यक्तिगत आराम के लिए कर सकता था। परंतु उन्होंने अपने यरूशलेम स्थित विशाल घर (अटारी) को परमेश्वर के राज्य, पवित्र आत्मा के आगमन और सताए जा रहे ईसाइयों की सुरक्षा के लिए समर्पित कर दिया।
• सच्ची वफादारी और संगति:** संत मरकुस ने अपने जीवन में प्रेरित पतरस और प्रेरित पौलुस जैसे महान अगवों से सीखा। वे जीवन के अंतिम क्षणों तक अपने विश्वास और अपनी सेवकाई के प्रति पूरी तरह वफादार बने रहे।
• निडरता और आत्मिक साहस:** सिकंदरिया जैसे बहुदेववादी और विरोधी माहौल में उन्होंने बिना किसी भय के प्रभु यीशु मसीह के जीवित सुसमाचार का प्रचार किया और हंसते-हंसते अपने प्राणों की आहुति दे दी।
---
विशेष स्पष्टीकरण एवं निष्कर्ष: संत मरकुस की माता मरिया और यीशु मसीह की माता मरिया में अंतर
पवित्र बाइबल के नए नियम को पढ़ते समय कई नए पाठक, शोधकर्ता और विश्वासी अक्सर 'मरिया' (मरियम) नाम को लेकर भ्रमित हो जाते हैं। प्रथम शताब्दी के यहूदी समाज में 'मरिया' (हिब्रू: मरियाम) एक अत्यंत प्रचलित, आम और लोकप्रिय नाम था। इस ऐतिहासिक और बाइबिल संबंधी भ्रम को दूर करने के लिए निम्नलिखित अंतर को पूरी गहराई से समझना आवश्यक है:
1. संत मरकुस की माता: यरूशलेम की मरिया (Mary of Jerusalem)
संत मरकुस की माता का नाम मरिया था, जिन्हें कलीसियाई इतिहास में **'यरूशलेम की मरिया'** या **'यूहन्ना मरकुस की माता मरिया'** कहा जाता है। वे यरूशलेम की एक अत्यंत धनाढ्य, संभ्रांत और प्रभावशाली महिला थीं। उनका अपना एक विशाल दोमंजिला भवन था जिसकी ऊपरी मंजिल (अटारी) में शुरुआती कलीसिया एकत्र होती थी। बाइबल के **प्रेरितों के काम 12:12** में उनका स्पष्ट उल्लेख मिलता है जहाँ लिखा है कि पतरस जेल से छूटने के बाद यूहन्ना मरकुस की माता मरिया के घर आया। वे प्रभु यीशु मसीह की समर्पित शिष्या थीं, परंतु वे यीशु मसीह की शारीरिक जन्मदात्री माता नहीं थीं।
2. प्रभु यीशु मसीह की माता: कुंवारी मरिया (Blessed Virgin Mary)
प्रभु यीशु मसीह की जन्मदात्री माता को *'कुंवारी मरिया' (Virgin Mary)* या *'नासरत की मरिया'* कहा जाता है। वे नासरत नगर की रहने वाली थीं और यूसुफ़ (Joseph) की पत्नी थीं। यद्यपि यीशु की माता मरिया भी पेन्तेकुस्त के दिन यरूशलेम की उसी अटारी में अन्य प्रेरितों के साथ प्रार्थना में उपस्थित थीं (बाइबल संदर्भ: *प्रेरितों के काम 1:14*), परंतु वह भवन उनका निजी घर नहीं था, बल्कि वह संत मरकुस की माता मरिया का घर था।
अतः, पाठकों को यह स्पष्ट रूप से ध्यान रखना चाहिए कि *संत मरकुस की माता मरिया और प्रभु यीशु मसीह की माता मरिया दो अलग-अलग ऐतिहासिक व्यक्तित्व हैं*। संत मरकुस यीशु मसीह के सगे भाई नहीं थे, बल्कि वे कलीसिया के एक समर्पित सेवक और सुसमाचार के रचयिता थे।
निष्कर्ष :-
संत मरकुस का संपूर्ण जीवन समर्पण, साहस, आत्मिक परिपक्वता, ऐतिहासिक योगदान और ईश्वरीय अनुग्रह का एक अद्वितीय उदाहरण है। सीरेने के एक समृद्ध यहूदी परिवार में जन्म लेने से लेकर यरूशलेम की अटारी (Mother Church of Jerusalem) में पवित्र आत्मा के अभिषेक का प्रत्यक्षदर्शी बनने, प्रेरितों के साथ दूर-दराज के देशों में सुसमाचार फैलाने, विश्व का सबसे प्राचीन सुसमाचार (मरकुस का सुसमाचार) लिखने, मिस्र में कॉप्टिक कलीसिया स्थापित करने और अंततः सिकंदरिया की सड़कों पर अपनी शहादत देने तक संत मरकुस का पूरा जीवन मसीही इतिहास की एक अमर गाथा है। उनकी यह अमर जीवन गाथा आज भी हर पाठक और विश्वासी को यह संदेश देती है कि परमेश्वर हमारी पुरानी कमजोरियों और असफलताओं को मिटाकर हमें अपने राज्य के लिए एक निडर, विश्वासयोग्य और सामर्थी योद्धा बना सकता है।
📌 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions)
Q1. संत मरकुस कौन थे?
उत्तर: संत मरकुस (Saint Mark) प्रथम शताब्दी की मसीही कलीसिया के सेवक, प्रेरित पतरस के अनुवादक और नए नियम के सबसे प्राचीन 'मरकुस के सुसमाचार' के रचयिता हैं। वे मिस्र की कॉप्टिक आर्थोडॉक्स कलीसिया के संस्थापक और अफ्रीका महाद्वीप के पहले विशप भी थे।
Q2. मरकुस की मृत्यु कैसे हुई थी?
उत्तर: कलीसियाई इतिहास के अनुसार, 68 ईस्वी में मिस्र के सिकंदरिया शहर में ईस्टर के दिन स्थानीय मूर्तिपूजकों ने संत मरकुस को पकड़ लिया। उनके गले में रस्सियाँ बाँधकर सिकंदरिया की पत्थरीली सड़कों पर दो दिनों तक घसीटा गया, जिससे अत्यधिक रक्तस्राव के कारण 25 अप्रैल 68 ईस्वी को वे शहीद हो गए।
Q3. क्या संत मरकुस की माता मरिया और प्रभु यीशु मसीह की माता मरिया एक ही हैं?
उत्तर: नहीं, ये दोनों अलग-अलग ऐतिहासिक व्यक्तित्व हैं। संत मरकुस की माता यरूशलेम की मरिया थीं, जिनका यरूशलेम में अपना विशाल दोमंजिला घर था (प्रेरितों के काम 12:12)। वहीं प्रभु यीशु की माता कुंवारी मरिया थीं, जो नासरत की रहने वाली थीं।
Q4. यरूशलेम की अटारी (Upper Room) का क्या महत्व है?
उत्तर: यरूशलेम की अटारी संत मरकुस की माता मरिया का घर था। यह स्थान मसीही इतिहास में "मदर चर्च ऑफ यरूशलेम" कहलाता है, जहाँ प्रभु यीशु ने अंतिम भोजन (Last Supper) किया था और पेन्तेकुस्त के दिन विश्वासी समाज पर पवित्र आत्मा का पहला महा-अभिषेक हुआ था।
Q5. संत मरकुस के अवशेष वर्तमान में कहाँ स्थित हैं?
उत्तर: 828 ईस्वी में सिकंदरिया से संत मरकुस के अवशेषों को इटली ले जाया गया था। वर्तमान में उनके पवित्र अवशेष इटली के वेनिस (Venice) शहर में स्थित प्रसिद्ध सेंट मार्क्स बेसिलिका (St. Mark's Basilica) कैथेड्रल में सुरक्षित रखे हुए हैं।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें