मत्ती कौन थे? जानिए मत्ती का सुसमाचार और उनका पूरा इतिहास


 मत्ती कौन थे? जानिए मत्ती का सुसमाचार और उनका पूरा इतिहास | Who was Saint Matthew? Know the Gospel of Matthew and His Full History


[ Introduction]         


जब हम पवित्र शास्त्र बाइबल के नए नियम के पन्नों को पलटना शुरू करते हैं, तो सबसे पहला नाम जो हमारे सामने अत्यंत आदर के साथ उभरकर आता है, वह है—मत्ती। 'मत्ती का सुसमाचार' नए नियम की वह प्रथम और ऐतिहासिक पुस्तक है, जो पुराने और नए कालखंड के बीच एक बेहद मजबूत आध्यात्मिक सेतु का काम करती है। लेकिन क्या आपने कभी ठहरकर और गहराई से यह सोचा है कि इस अद्भुत ग्रंथ को रचने वाला वह शख्स असल में कौन था? ईसा मसीह के पावन चरणों में बैठने से पहले उसका सामाजिक जीवन किस प्रकार का था? और क्यों उसकी इस अनूठी रचना को संपूर्ण बाइबल में इतना विशिष्ट और अग्रिम स्थान प्रदान किया गया है? आज के इस विस्तृत और गंभीर अध्ययन में, हम मत्ती के जीवन के हर एक अनछुए पहलू को खंगालेंगे और यह समझेंगे कि कैसे एक साधारण और समाज द्वारा ठुकराए गए इंसान का जीवन, परमेश्वर की एक पुकार पर पूरी तरह से रूपांतरित हो गया।


टैक्स कलेक्टर से यीशु के प्रेरित बने सेंट मत्ती की मिशनरी यात्राओं को दर्शाता एक ऑइल पेंटिंग चित्र


पारिवारिक पृष्ठभूमि और नाम बदलने का वह आत्मिक रहस्य

ऐतिहासिक और शास्त्र सम्मत साक्ष्यों के अनुसार, मत्ती का शुरुआती जीवन यहूदिया प्रांत के कफरनहूम नामक एक अत्यंत समृद्ध, व्यापारिक और हलचल भरे शहर में बीता था। वह अलफइया नाम के एक साधारण यहूदी व्यक्ति का पुत्र था। मसीह यीशु के अलौकिक संपर्क में आने से पहले दुनिया उसे 'लेवी' के नाम से पुकारती थी। पवित्र बाइबल के इतिहास में यह एक अकाट्य और सुंदर नियम सा रहा है कि जब भी कोई व्यक्ति परमेश्वर के जीवित संपर्क में आता है, तो उसके पुराने अस्तित्व को एक नया आयाम और नई पहचान मिलती है; ठीक वैसे ही, जैसे साइमन का नाम बदलकर पतरस रखा गया था। इसी क्रम में, जब levi ने अपने सारे सांसारिक बंधनों और असुरक्षाओं को त्यागकर मसीह का अनुसरण किया, तो उनका नाम बदलकर 'मत्ती' कर दिया गया। इब्रानी भाषा में 'मत्ती' शब्द का बहुत ही पावन और गहरा अर्थ होता है—"परमेश्वर का दान" या "ईश्वर का अनमोल उपहार"। यह नाम उनके जीवन के उस महान आत्मिक परिवर्तन का प्रतीक बन गया, जहाँ वे अपने बीते हुए कल को पीछे छोड़कर एक नए रूप में प्रकट हुए।


मत्ती का पुराना पेशा: एक बदनाम टैक्स कलेक्टर की कड़वी सच्चाई

मसीह के बारह चुनिंदा प्रेरितों में गिने जाने से पूर्व, मत्ती का जीवन किसी संत या धार्मिक गुरु की तरह कतई नहीं था, बल्कि वे रोमन साम्राज्य के अधीन एक टैक्स कलेक्टर यानी चुंगी लेने वाले केे रूप में कार्य करते थे। उस दौर के यहूदी समाज में टैक्स कलेक्टर्स को सबसे भ्रष्ट, पापी और गिरा हुआ इंसान माना जाता था, और आम जनता के दिलों में उनके प्रति घोर नफरत की भावना कूट-कूट कर भरी रहती थी। इसके पीछे मुख्य रूप से दो बड़ी वजहें थीं। पहली यह कि वे स्वयं यहूदी होकर भी रोमन आक्रांताओं के लिए कर वसूलते थे, जिन्होंने उस समय यहूदियों की स्वतंत्रता छीन रखी थी, जिसके चलते उन्हें अपनी ही कौम की नजरों में एक 'देशद्रोही' का दर्जा मिला हुआ था। दूसरी वजह यह थी कि ये अधिकारी रोमन सरकार द्वारा तय की गई राशि से कहीं अधिक धन अपनी जेबें भरने के लिए जनता से जबरन वसूलते थे। इस प्रकार, मत्ती के पास अपार धन-दौलत और भौतिक सुख-सुविधाएं तो थीं, परंतु सामाजिक स्तर पर उनके हिस्से में केवल दुत्कार, तिरस्कार और एक गहरा अकेलापन ही था।


वो ऐतिहासिक क्षण: जब मसीह की एक पुकार ने सब कुछ बदल डाला

मत्ती के जीवन का सबसे निर्णायक और चमत्कारी मोड़ तब आया, जब उनकी प्रत्यक्ष भेंट स्वयं ईसा मसीह से हुई। बाइबल के मत्ती रचित सुसमाचार के नवें अध्याय में इस मार्मिक घटना का बहुत ही जीवंत वर्णन मिलता है। मत्ती अपने रोज़मर्रा के नियमों के अनुसार कफरनहूम स्थित अपनी चुंगी की चौकी पर बैठकर पैसों और बही-खातों का हिसाब-किताब देखने में व्यस्त थे। तभी अचानक उस मार्ग से मसीह यीशु का गुजरना हुआ। यीशु ने अपनी करुणा भरी दिव्य दृष्टि मत्ती पर डाली और उनके अतीत के किसी भी दाग या उनकी बदनाम नौकरी की परवाह किए बिना, सिर्फ दो अत्यंत सरल किंतु शक्तिशाली शब्द कहे—"मेरे पीछे हो ले।" वह अलौकिक पुकार इतनी प्रभावशाली थी कि मत्ती ने बिना किसी प्रकार की बहस, संकोच या तर्क के, उसी क्षण अपना सब कुछ वहीं छोड़ दिया। उन्होंने अपनी सुरक्षित सरकारी नौकरी, अपनी भारी कमाई का जरिया और अपने उस पूरे भौतिक संसार को एक पल में त्याग दिया और मसीह के पीछे चल पड़े।


मत्ती के घर पर वह भव्य दावत: पापियों और मसीह का अद्भुत मिलन

यीशु के शिष्य बनने के उपरांत, मत्ती के हृदय में जो आत्मिक आनंद उमड़ा, उसे उन्होंने अपने मित्रों के साथ भी बांटने का निर्णय किया। उन्होंने अपने निवास स्थान पर एक बहुत बड़ी दावत का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने अपने पुराने वृत्त के लोगों यानी अन्य टैक्स कलेक्टर्स और समाज द्वारा 'पापी' घोषित किए गए कई बदनाम लोगों को विशेष रूप से आमंत्रित किया, ताकि वे भी उस पवित्र उपस्थिति का अनुभव कर सकें। जब उस दौर के तथाकथित धार्मिक ठेकेदारों यानी फरीसियों और शास्त्रियों ने इस दृश्य को देखा, तो उन्होंने मसीह के शिष्यों पर कड़ी आपत्ति जताते हुए पूछा कि तुम्हारा गुरु इन पापी और भ्रष्ट लोगों के साथ भोजन क्यों करता है? इस पर यीशु ने मत्ती के घर पर वह शाश्वत सत्य कहा जो आज भी इतिहास में अमर है कि वैद्यों की आवश्यकता भले चंगों को नहीं, बल्कि बीमारों को होती है, और वह धर्मियों को नहीं बल्कि पापियों को ही पश्चाताप के लिए बुलाने आए हैं। यह प्रसंग इस बात की गवाही देता है कि मत्ती अपने जीवन में उद्धार पाकर इतने कृतज्ञ थे कि वे अपने पूरे पुराने समाज को भी उसी ज्योति तक पहुँचाना चाहते थे।


एक प्रेरित के रूप में मत्ती का साढ़े तीन साल का वह गहन सफर

मसीह यीशु के साथ मत्ती ने लगभग साढ़े तीन वर्षों का एक बेहद लंबा, सघन और जीवन को बदल देने वाला समय व्यतीत किया। इन वर्षों के दौरान वे यीशु के उन बारह सबसे अंतरंग प्रेरितों में शामिल रहे, जिन्होंने उनके हर एक कदम और चमत्कार को बहुत निकटता से देखा था। मत्ती ने अपनी इन आँखों से यीशु को नेत्रहीनों को दिव्य दृष्टि देते, भयंकर कोढ़ियों को चंगा करते, उफनते हुए तूफानी समुद्र को शांत करते और यहाँ तक कि मृत शरीरों में फिर से प्राण फूंकते हुए देखा था। वे केवल एक साधारण दर्शक बनकर मसीह के साथ नहीं चल रहे थे, बल्कि वे मसीह के मुख से निकलने वाली हर एक अनमोल शिक्षा को अपने मन के भीतर गहराई से उतार रहे थे। उन्होंने क्रूस पर दिए जाने वाले उस असहनीय दर्द को भी बेहद नजदीक से महसूस किया और बाद में यीशु के पुनरुत्थान के प्रत्यक्षदर्शी गवाह भी बने। इन साढ़े तीन वर्षों के अनुभवों ने मत्ती को एक आम सांसारिक व्यक्ति से उठाकर विश्वास और गवाही का एक अटूट स्तंभ बना दिया।


'मत्ती के सुसमाचार' की रचना और उसका सुदूर आध्यात्मिक उद्देश्य

यीशु के स्वर्गारोहण के पश्चात, पवित्र आत्मा की प्रेरणा से मत्ती ने नए नियम की सबसे पहली और अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तक की रचना की, जिसे आज पूरी दुनिया 'मत्ती का सुसमाचार' के रूप में जानती है। मत्ती ने इस महाकाव्य जैसी रचना को मुख्य रूप से अपने यहूदी भाइयों और पाठकों की मानसिकता को ध्यान में रखकर गढ़ा था। उनका प्राथमिक उद्देश्य इस अकाट्य तथ्य को स्थापित करना था कि यीशु ही वे लंबे समय से प्रतीक्षित 'मसीहा' हैं, जिनके आगमन की भविष्यवाणियां पुराने नियम के नबी सदियों पहले कर चुके थे। यही कारण है कि इस ग्रंथ की शैली बेहद तार्किक, गंभीर, प्रामाणिक और अकाट्य ऐतिहासिक साक्ष्यों से परिपूर्ण है, जो किसी भी जिज्ञासु या संशयवादी पाठक के मन को पूरी तरह संतुष्ट कर सकती है।


पुराने नियम की भविष्यवाणियों के साथ एक सटीक और अटूट तालमेल

मत्ती के सुसमाचार की सबसे बड़ी साहित्यिक और आध्यात्मिक विशेषता यह है कि यह पुराने नियम और नए नियम के बीच एक ऐसा अटूट वैचारिक पुल बनाता है, जहाँ दोनों कालखंड एक-दूसरे में विलीन होते दिखाई देते हैं। मत्ती ने अपनी इस संपूर्ण पुस्तक में साठ से भी अधिक बार पुराने नियम के वचनों, पवित्र आयतों और नबियों की भविष्यवाणियों का सीधा और सटीक संदर्भ दिया है। जब भी वे यीशु के जीवन की किसी भी घटना—चाहे वह उनका अद्भुत जन्म हो, उनकी गहन उपदेशात्मक शैली हो, या उनके द्वारा उठाए गए दुःख हों—का वर्णन करते हैं, तो वे इस बात को रेखांकित करना नहीं भूलते कि "यह सब इसलिए घटित हुआ, ताकि नबी के माध्यम से कहा गया वचन अपनी पूरी सच्चाई के साथ पूरा हो सके।" यह सूक्ष्म कला इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि मत्ती को अपने प्राचीन धर्मग्रंथों का कितना अगाध ज्ञान था और वे हर विवरण को सबूत के साथ प्रस्तुत कर रहे थे।


यीशु की शाही वंशावली को दर्ज करने का वह विधिक और ऐतिहासिक महत्व

यदि कोई पाठक मत्ती रचित सुसमाचार के पहले अध्याय को खोलता है, तो उसकी शुरुआत में एक बहुत लंबी और विस्तृत वंशावली से भेंट होती है। पहली नजर में यह किसी को भी एक सामान्य या जटिल सूची लग सकती है, परंतु मत्ती ने इसे बहुत ही गहरी सोची-समझी रणनीति के तहत सबसे पहले स्थान पर रखा था। प्राचीन यहूदी नियमों और सामाजिक परंपराओं के अनुसार, आने वाले मसीहा के लिए यह अनिवार्य शर्त थी कि वह राजा दाऊद और कुलपिता अब्राहम के पवित्र वंश से ही ताल्लुक रखता हो। मत्ती ने अपनी पुरानी प्रशासनिक और क्लर्क जैसी दक्षता का उपयोग करते हुए, अब्राहम और दाऊद के राजवंश से होते हुए यूसुफ और मरियम तक की पूरी कानूनी और वंशावली से जुड़ी कड़ियों को दस्तावेजी रूप में दर्ज किया। इसके माध्यम से उन्होंने यहूदियों के समक्ष यह विधिक रूप से प्रमाणित कर दिया कि यीशु ही वे वास्तविक राजाओं के राजा और सच्चे मसीहा हैं, जिनका वादा युगों पहले किया गया था।


एक कुशल टैक्स कलेक्टर की अनूठी लेखन शैली का अमिट प्रभाव

जब मत्ती ने मसीह के मार्ग को अपनाया, तो उनकी पुरानी लेखन, पठन और हर छोटी बात का हिसाब रखने की कला व्यर्थ नहीं गई, बल्कि वह परमेश्वर के महान उद्देश्य के अधीन उपयोग की गई। एक पूर्व टैक्स कलेक्टर होने के नाते, उन्हें हर विवरण को अत्यंत व्यवस्थित, क्रमबद्ध और त्रुटिहीन तरीके से सहेजने की आदत थी। यही कारण है कि मत्ती का सुसमाचार पूरी बाइबल में सबसे अधिक सुव्यवस्थित और क्रोनोलॉजिकल रूप से संरचित ग्रंथों में से एक माना जाता है। उन्होंने यीशु की शिक्षाओं और प्रवचनों को पांच प्रमुख बड़े खंडों में खूबसूरती से विभाजित किया है, जो प्राचीन काल की मूसा की पांच व्यवस्था की पुस्तकों की याद ताजा कराते हैं। इसके अलावा, पूरे नए नियम में मत्ती ने वित्तीय शब्दावली, विभिन्न मुद्राओं जैसे कि टैलेंट और डेनารियस, तथा कर संबंधी लेन-देन का उल्लेख अन्य लेखकों की तुलना में कहीं अधिक गहराई से किया है, जो उनके पुराने पेशे के तार्किक अनुशासन की जीवंत छाप छोड़ता है।


पहाड़ी उपदेश का ऐतिहासिक और नैतिक दस्तावेजीकरण

मसीह यीशु के द्वारा दिए गए सभी उपदेशों में सबसे अधिक प्रसिद्ध, क्रांतिकारी और जीवन-परावर्तक 'पहाड़ी उपदेश' माना जाता है, जो मत्ती की इस पुस्तक के पांचवें अध्याय से लेकर घोषित सातवें अध्याय तक पूर्ण विस्तार के साथ समाहित है। मत्ती ने इस अद्वितीय उपदेश को इतनी बारीकी, तन्मयता और प्रामाणिकता के साथ लिपिबद्ध किया है कि आज भी इसे मानव सभ्यता के इतिहास में नैतिकता, अध्यात्म और मानवीय मूल्यों का सबसे महान लिखित दस्तावेज माना जाता है। इस सुविख्यात उपदेश के भीतर वे 'धन्य वचन', नमक और प्रकाश के गहरे दृष्टांत, अपने शत्रुओं से भी असीम प्रेम करने की कठिन किंतु सुंदर शिक्षा, तथा वह चिर-परिचित 'प्रभु की प्रार्थना' शामिल हैं। मत्ती ने इन शाश्वत सत्यों को शब्द-दर-शब्द सहेजकर आने वाली समस्त मानव जातियों और पीढ़ियों पर एक ऐसा अमूल्य आत्मिक उपकार किया है, जिसे कभी चुकाया नहीं जा सकता।


मत्ती का अंतिम जीवन, साहसिक मिशनरी यात्राएं और उनकी महान शहादत

स्वर्ग में यीशु के पुनरुत्थान के बाद और पिन्तेकुस्त के पावन दिन पर जब प्रेरितों पर पवित्र आत्मा की सामर्थ्य उतरी, तो मत्ती ने यरूशलेम और आसपास के यहूदिया के क्षेत्रों में बेहद सक्रिय रूप से सुसमाचार के संदेश का प्रसार किया। इसके पश्चात, जब यरूशलेम के भीतर मसीही विश्वासियों पर भयंकर सतावट और अत्याचार का दौर शुरू हुआ, तो वे अन्य प्रेरितों के साथ बाहर निकल पड़े। शुरुआती ईसाई परंपराओं और इतिहासकार यूसेबियस जैसे प्राचीन विद्वानों के दस्तावेजों के अनुसार, मत्ती ने सीरिया, फारस और इथियोपिया जैसे दूर-दराज के और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों वाले देशों की लंबी यात्राएं कीं, जहाँ उन्होंने आदिवासियों और गैर-यहूदी समाजों के बीच शांति, प्रेम और मुक्ति का संदेश पहुँचाया। अपने जीवन की अंतिम संध्या में, मसीह के उसी महान संदेश की गवाही देते हुए वे अपने प्राणों की आहुति देकर शहीद हो गए। यद्यपि उनकी मृत्यु के सटीक स्थान और उसकी विधि को लेकर इतिहासकारों के बीच कुछ अलग-अलग मत पाए जाते हैं, किंतु इस बात में कोई संदेह नहीं कि उनका संपूर्ण जीवन उस दिव्य मार्ग के लिए पूरी तरह समर्पित रहा।


[निष्कर्ष - Conclusion ]

सेंट मत्ती का यह पूरा जीवनवृत्त मानवता को एक ऐसा सबसे बड़ा और प्रेरणादायक संदेश देता है कि आपका अतीत चाहे कितना भी दागदार या निराशाजनक क्यों न हो, वह कभी भी परमेश्वर की योजना और आपके भविष्य के आड़े नहीं आ सकता। समाज भले ही आपको तिरस्कृत कर दे, आपकी त्रुटियों के कारण आपका सामाजिक बहिष्कार कर दे अथवा आपको पापी मानकर किनारे कर डाले, परंतु यदि आप जीवन के किसी भी मोड़ पर मसीह की एक सच्ची और आत्मीय पुकार को सुनकर अपना सब कुछ त्यागने और खुद को पूरी तरह बदलने का संकल्प लेते हैं, तो वह आपके साधारण जीवन को भी इतिहास के पन्नों में अमर बना सकते हैं। एक बदनाम और ठुकराए हुए टैक्स कलेक्टर से लेकर बाइबल के पहले सुसमाचार के इस महान, प्रामाणिक और ज्ञानी लेखक तक की उनकी यह अद्भुत यात्रा हर इंसान के हृदय में एक नई आशा की अलख जगाती है। आज से हज़ारों वर्ष बीत जाने के बाद भी उनकी यह अमर कृति दुनिया भर के करोड़ों पाठकों और खोजियों का सही दिशा में मार्गदर्शन करती चली आ रही है।

सेंट मत्ती से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण सवाल-जवाब (FAQs)

सवाल: मत्ती का सुसमाचार किसने और कब लिखा था?
जवाब: मत्ती का सुसमाचार ईसा मसीह के बारह प्रेरितों में से एक, सेंट मत्ती (लेवी) द्वारा पवित्र आत्मा की प्रेरणा से लिखा गया था। अधिकांश इतिहासकारों और बाइबल विद्वानों के अनुसार, इस पवित्र पुस्तक की रचना लगभग 50 से 70 ईस्वी (AD) के बीच यहूदिया प्रांत में की गई थी।

सवाल: ईसा मसीह से मिलने से पहले मत्ती क्या काम करते थे?
जवाब: ईसा मसीह का शिष्य बनने से पहले मत्ती कफरनहूम शहर में एक रोमन टैक्स कलेक्टर (चुंगी लेने वाले) के रूप में कार्य करते थे। उस दौर के यहूदी समाज में इस पेशे से जुड़े लोगों को देशद्रोही और पापी मानकर उनका सामाजिक बहिष्कार किया जाता था।

सवाल: बाइबल में मत्ती नाम का क्या अर्थ होता है?
जवाब: मूल इब्रानी (Hebrew) भाषा में 'मत्ती' नाम का बहुत ही सुंदर और आत्मिक अर्थ होता है—"परमेश्वर का दान" या "ईश्वर का अनमोल उपहार"। यह नाम उनके जीवन के उस संपूर्ण रूपांतरण को दर्शाता है जो मसीह की एक पुकार पर हुआ था।

सवाल: मत्ती के सुसमाचार का मुख्य उद्देश्य क्या था?
जवाब: मत्ती के सुसमाचार का प्राथमिक उद्देश्य विशेष रूप से यहूदी पाठकों को यह अकाट्य प्रमाण देना था कि यीशु मसीह ही वे सच्चे मसीहा हैं, जिनका वादा और भविष्यवाणी पुराने नियम के नबियों द्वारा सदियों पहले की गई थी।